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Haiwaan Review: सस्पेंस खुलने तक धैर्य की परीक्षा लेती है हैवान

अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। प्रियदर्शन की यह फिल्म मोहनलाल की ओप्पम का हिंदी रीमेक है।

Bollywood;  हैवान की रिलीज से पहले फिल्‍ममेकर प्रियदर्शन ने बताया था कि कई कलाकारों ने खलनायक की भूमिका निभाने से इनकार कर दिया था, जब अक्षय कुमार ने यह भूमिका सुनी तो उन्‍होंने झट से इसे स्‍वीकार कर लिया। ‘हैवान’ प्रियदर्शन की ही साल 2016 की मलयालम फिल्म ओप्‍पम ( Oppam) की हिंदी रीमेक है। मूल फिल्म में मोहनलाल ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

हिंदी संस्‍करण में उनकी जगह सैफ अली खान ने ली है। क्राइम-एक्शन मिस्ट्री थ्रिलर के तौर पर प्रचारित इस फिल्‍म में खलनायक को संवादों से हैवान बताया गया है, लेकिन स्‍क्रीन पर खौफ परिलक्षित नहीं होता। खास बात यह है कि प्रियदर्शन, अभिलाष नायर और रोहन शंकर द्वारा लिखा स्‍क्रीन प्‍ले अधिकतम मूल फिल्‍म की तरह ही है।

परशुराम के बदले की कहानी है ‘हैवान’

कहानी बचपन से नेत्रहीन श्‍याम (सैफ अली खान) के इर्दगिर्द घूमती है। उस पर पारिवारिक जिम्‍मेदारियों का दबाव है। वह कुश्‍ती में पारंगत होने के साथ गाना भी गाता है। उसके सुनने की क्षमता तीव्र है। वह चीजों को सूंघकर पहचान लेता है। श्‍याम मुंबई की एक आलीशन बिल्डिंग का मेंटेनेंस मैनेजर है। वह उस बिल्डिंग में रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस प्रधान (बमन ईरानी) का दायां हाथ है।

प्रधान उसे बताते हैं कि दुष्‍कर्म के मामले में युवा परशुराम गोखले (अक्षय कुमार) को उन्‍होंने सात साल की सजा सुनाई थी, क्‍योंकि सारे सुबूत उसके खिलाफ थे, लेकिन उन्‍हें लगा था कि परशुराम निर्दोष है। समाज ने उसके परिवार को तंग करना शुरू कर दिया जिसकी वजह से पिता ने पूरे परिवार को ज‍हर दे दिया था। इस घटना से परशुराम सदमे में चला गया और कई साल मानसिक अस्‍पताल में रहा।

अब वह उन लोगों से बदला ले रहा है जो उसकी सजा के जिम्‍मेदार थे। परशुराम अब अविवाहित प्रधान की नाजायज सात साल की बेटी नंदिनी (पहल अशोक चौधरी) को ढूढ़ रहा है, ताकि उसे भी मार सके। सिर्फ श्‍याम को नंदिनी के बारे में पता है। परशुराम उसी बिल्डिंग में रहने आता है और एक रात अपार्टमेंट में शादी के दौरान प्रधान की हत्‍या कर देता है। नंदिनी को परशुराम कैसे खोजेगा? श्‍याम उसे बचा पाएगा? कहानी इस संबंध में है।

प्रतिशोध की आग में जलता खलनायक नहीं बना दमदार

प्रियदर्शन ने हिंदी में भले ही कॉमेडी फिल्‍में बनाई है, लेकिन मलयालम में उनका एक गंभीर फिल्मकार वाला पक्ष भी सामने आता है। हैवान उसी शैली की फिल्‍म है। हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी धीमी रफ्तार है। पात्रों को स्थापित करने में काफी समय लिया गया है। दूसरा, फिल्‍म में हीरो तभी उभर कर सामने आ पाता है जब खलनायक दमदार हो। यहां पर खलनायक प्रतिशोध की आग में जल रहा है, लेकिन उसकी ज्‍वाला परदे पर धधकती हुई नजर नहीं आती है।

प्रधान की ही बिल्डिंग में परशुराम रह रहा है। वह महिला उसका साथ क्‍यों दे रही है? उसकी वजह भी कहानी में स्‍पष्‍ट नहीं है। परशुराम जज और उसके मामले से जुड़े लोगों को परिवार समेत मार रहा है, लेकिन उस बिल्डर को क्‍यों नहीं मारता जिसने उसे झूठा मामले में फंसाया था? प्रधान पुलिस की मदद से परशुराम को क्‍यों नहीं खोजते? ऐसे कई सवालों के जवाब कहानी में नहीं मिलते।

फिल्‍म का एक दृश्‍य है जब बिल्डिंग में रहने में दो अलग अलग जाति के लड़के-लड़की के प्रेम का पता चलने पर शादी को लेकर बिल्डिंग में बातचीत होती है। यह अपच है। हालांकि, श्‍याम और परशुराम के बीच आपसी भिड़ंत के सीन रोचक हैं। कहानी में आखिर के लिए रहस्‍य रखा गया है, लेकिन अगर आपने मूल फिल्‍म नहीं देखी है तो भी पूर्वानुमान आसानी से लगा सकते हैं। फिल्म में तीन गाने हैं, जिनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो आखिर में याद रहे। कुल मिलाकर जब असली थ्रिलर शुरू होता है, तब तक आपके धैर्य की परीक्षा हो चुकी होती है।

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